Class 11-Tulasi key Dohey-PDF download-तुलसी के दोहे (Tulsidas’s Couplets)

By Hari Prasad

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Class 11-Tulasi key Dohey-तुलसी के दोहे (Tulsidas's Couplets)

Class 11-Tulasi key Dohey-PDF download-कवि परिचय (Poet Introduction)

Class 11-Tulasi key Dohey-तुलसीदास रामभक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। उनका जन्म 1532 ई. (विक्रम संवत 1589) तथा मृत्यु 1623 ई. (विक्रम संवत 1680) में हुई। उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। उनके बचपन का नाम रामबोला था। उनका बचपन बहुत कष्टों में बीता। उनके जन्म के बाद ही तुलसी की माता का देहांत हो गया था। मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण पिता ने उनका त्याग कर दिया। उनका पालन-पोषण मुनिया नामक एक दासी ने किया था।

तुलसीदास के गुरु का नाम नरहरिदास था। उन्होंने तुलसी को वेद, पुराण, शास्त्र आदि का ज्ञान दिया। नरहरिदास ने ही तुलसी को तुलसीदास नाम दिया था। तुलसी का विवाह रत्नावली नामक कन्या से हुआ था।

साहित्यिक योगदान (Literary Contribution)

तुलसीदास जी के मुख्यतः बारह ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं। वे हैं—रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, पार्वती-मंगल, जानकी-मंगल, वैराग्य-संदीपनी, कृष्ण-गीतावली, बरवै रामायण, रामलला नहछू, रामाज्ञा प्रश्नावली।

तुलसीदास जी का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक और गहरा है। उन्होंने अपनी प्रतिनिधि रचना ‘रामचरितमानस’ (महाकाव्य) के माध्यम से भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप को जन-जन तक पहुँचाया और उन्हें आदर्श चरित्र के रूप में स्थापित किया। उनकी भक्ति-भावना अत्यंत निर्मल और उदात्त थी। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से ज्ञान, कर्म और भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

‘रामचरितमानस’ के माध्यम से उन्होंने अवधी भाषा को एक साहित्यिक गरिमा प्रदान की और वहीं ‘विनयपत्रिका’ तथा ‘कवितावली’ के द्वारा ब्रजभाषा में भी उत्कृष्ट काव्य-सृजन किया।

दोहों का परिचय (Introduction to the Couplets)

Class 11-Tulasi key Dohey-तुलसीदास जी के दोहे भारतीय संस्कृति और आदर्श जीवन मूल्यों की अनमोल धरोहर हैं। यहाँ दिए गए दोहों में तुलसीदास जी ने कर्मठता, आत्म-सम्मान और प्रभु की भक्ति का मार्ग दिखाया है। उन्होंने बताया है कि संत का स्वभाव आम के वृक्ष जैसा परोपकारी होना चाहिए। वीर पुरुष कर्म करते हैं, बातें नहीं बनाते। माता-पिता और गुरुजनों से कभी रूठना नहीं चाहिए। इनसे जीतकर भी हमारी हार ही होती है।

तुलसीदास काम, क्रोध जैसे विकारों को त्यागकर आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। साथ ही, ये दोहे हमें सिखाते हैं कि एक राज्य की प्रगति के लिए सच्चे और निडर सचिव, वैद्य और गुरु का होना कितना आवश्यक है और एक मुखिया को किस प्रकार विवेक के साथ संपूर्ण समाज का पोषण करना चाहिए। ये दोहे हर युग के लिए उत्तम जीवन-संदेश हैं।

तुलसी के दोहे (Tulsidas’s Couplets)

Class 11-Tulasi key Dohey-1-तुलसी के दोहे (Tulsidas's Couplets)

1.
तुलसी संत सुअंबतरू, फूलि फरहिं पर हेत।
इतते वे पाहन हनैं, उतते वे फल देत।।

2.
सूर समर करनी करहिं, कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु, कायर कथहिं प्रतापु।।

3.
जो परि पायँ मनाइए, तासौं रूठि बिचारि।
तुलसी तहाँ न जीतिए, जहाँ जीतेहुँ हारि।।

4.
काम, क्रोध, मद, लोभ सब, नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि, भजहु भजहिं जेहि संत।।

5.
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहिं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह।।

6.
सचिव, बैद, गुर तीनि, जौं प्रिय बोलहिं भयआस।
राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास।।

7.
मुखिआ मुखु सो चाहिए, खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग, तुलसी सहित बिबेक।।

8.
आपन छोड़ो साथ सब, जब दीन हितु ना कोई।
तुलसी अंबुज अंबु बिन, तरीन तासु रिपु होई।।

शब्दार्थ और भाव (Word Meanings and Explanation)

दोहा 1 (Class 11-Tulasi key Dohey-Couplet 1)

सुअंबतरू = मीठे आम का पेड़
फूलि फरहिं = फूलना-फलना
पर हेत = दूसरों की भलाई के लिए
इतते = जितने
पाहन = पत्थर
हनैं = मारना
उतते = उतने

भाव: इस दोहे में संतों की तुलना आम के वृक्ष से की गई है। जैसे आम का पेड़ हमेशा दूसरों की भलाई के लिए फूलता और फलता है, वैसे ही सच्चे संत भी निःस्वार्थ भाव से लोगों का भला करते हैं। कवि कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति आम के पेड़ पर पत्थर भी मारता है, तो भी पेड़ बदले में उसे मीठे फल ही देता है।

ठीक इसी प्रकार, संतजन भी दूसरों के बुरे या कष्ट देने वाले व्यवहार के बदले हमेशा भलाई और प्रेम ही देते हैं। संतों का स्वभाव क्षमा, परोपकार और प्रेम से भरा होता है। यह दोहा हमें सिखाता है कि संतों की तरह बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए अच्छा ही करना चाहिए, भले ही वे हमारे साथ कैसा भी व्यवहार क्यों न करें।

दोहा 2 (Class 11-Tulasi key Dohey-Couplet 2)

सूर = शूरवीर
समर = युद्ध (युद्ध का मैदान)
जनावहिं = जताना, बताना
रिपु = दुश्मन
कथहिं = कहना/करना
प्रतापु = वीरता

भाव: यह दोहा वीरता और कायरता के बीच का अंतर स्पष्ट करता है। सच्चे शूर (सूर) युद्ध के मैदान में अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हैं, वे सिर्फ बातें बनाकर खुद की बड़ाई नहीं करते। उनकी करनी (कार्य) ही उनकी पहचान होती है।

इसके विपरीत, कायर व्यक्ति (डरपोक) जब अपने दुश्मन (रिपु) को युद्ध के मैदान में देखते हैं, तो वे लड़ने के बजाय केवल अपनी प्रशंसा और ताकत की बड़ी-बड़ी बातें (प्रताप) करते हैं। वे काम करने से भागते हैं और केवल बड़ी-बड़ी बातें करके खुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं।

यह दोहा हमें सिखाता है कि बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय, हमें अपने काम और कर्म से अपनी योग्यता और साहस सिद्ध करना चाहिए।

दोहा 3 (Class 11-Tulasi key Dohey-Couplet 3)

परि = गिरकर, पड़कर
पायँ = पैर
रूठि = रूठना
बिचारी = विचार करना
जीतेहुँ = जीतकर भी

भाव: तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन माता-पिता, आचार्य, गुरुजन आदि को उनके पैरों पर पड़कर मनाना हमारा कर्तव्य है। उनसे बहुत ही सोच-विचारकर रूठना चाहिए। वे कहते हैं कि जहाँ जीतने में भी हार ही होती है, वहाँ जीतना नहीं चाहिए।

प्रस्तुत दोहे के माध्यम से हमें नैतिकता, मानवीयता और बड़ों के प्रति आदर भाव रखने की शिक्षा प्राप्त होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि किसी ऐसी स्थिति में हमारी जीत भी हो जाए, जिसमें माता-पिता या गुरुजनों के प्रति सम्मान कम हो, तो ऐसी जीत वास्तव में हार के समान है।

दोहा 4

शब्दार्थ:

  • काम = कामना, इच्छा
  • क्रोध = गुस्सा
  • मद = नशा
  • लोभ = लालच
  • सब = सभी, ये चारों (काम, क्रोध, मद, लोभ)
  • नाथ = स्वामी, प्रभु
  • नरक के पंथ = कष्टमय जीवन या दुर्गति के मार्ग
  • परिहरि = त्याग कर, छोड़ कर
  • भजहु = भजन करो, स्मरण करो, सेवा करो
  • भजहिं = भजन करते हैं, पूजा करते हैं
  • जेहि = जिनको, जिनका
  • संत = साधु, सज्जन, महात्मा

भाव:
तुलसीदास जी कहते हैं—“काम (वासना), क्रोध, मद (अहंकार) और लोभ—ये सभी नरक के रास्ते हैं, जो मनुष्य को दुर्गति की ओर ले जाते हैं। अतः इन सब दुर्गुणों को त्याग कर, तुम प्रभु का भजन करो, जिनका स्मरण साधु और महात्मा किया करते हैं।”

इस दोहे में तुलसीदास जी मनुष्य को चार मुख्य विकारों—काम, क्रोध, मद और लोभ—से दूर रहने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि ये आत्मा के पतन का कारण बनते हैं। वे मुक्ति और परम शांति का मार्ग बताते हुए कहते हैं कि इन विकारों को त्याग कर केवल प्रभु की भक्ति और शरण ही जीवन का सच्चा लक्ष्य होना चाहिए, क्योंकि यही वह मार्ग है जिसका अनुसरण ज्ञानी और संत पुरुष करते हैं।


दोहा 5-Class 11-Tulasi key Dohey-couplet 5

शब्दार्थ:

  • हरषै = खुशी, प्रसन्नता
  • नैनन = आँख
  • सनेह = स्नेह
  • तहाँ = वहाँ
  • कंचन = सोना
  • मेह = बादल

भाव:
इस दोहे में तुलसीदास जी बताते हैं कि हमें किन लोगों के पास नहीं जाना चाहिए। वे कहते हैं कि जिस घर में आपके आने पर लोग खुश न हों (हरषै नहिँ) और जिनकी आँखों में आपके लिए प्यार या स्नेह (प्रेम) न दिखाई दे, ऐसी जगह पर हमें कभी नहीं जाना चाहिए।

कवि ने एक बहुत बड़ी बात कही है कि भले ही उस जगह पर सोने की बारिश ही क्यों न हो रही हो—अर्थात वह व्यक्ति चाहे कितना भी धनवान या बड़ा क्यों न हो। इसका अर्थ है कि धन-दौलत और भौतिक सुख-सुविधाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा आत्म-सम्मान, इज्जत और प्रेमपूर्ण संबंध हैं। जहाँ सम्मान नहीं मिलता, वहाँ नहीं जाना चाहिए, चाहे कितना भी फायदा क्यों न हो।

नोट: इस स्कैन में दोहा 5 की मूल पंक्तियाँ पूरी तरह दिखाई नहीं दे रही हैं; पेज 4 के अभ्यास में इसकी पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से दी गई हैं।


दोहा 6-Class 11-Tulasi key Dohey-couplet 6

शब्दार्थ:

  • बैद = चिकित्सक
  • गुर = गुरु
  • बोलहिं = बोलना
  • भय आस = डर के कारण
  • तन = शरीर
  • तीनि कर = तीनों का
  • बेगिहीं = तुरंत, जल्दी ही
  • नास = नुकसान

भाव:
यह दोहा जीवन के तीन सबसे महत्वपूर्ण सलाहकारों के बारे में है—सचिव (सलाहकार), वैद्य (चिकित्सक) और गुरु (शिक्षक/मार्गदर्शक)

तुलसीदास जी कहते हैं कि जब सचिव, वैद्य और गुरु—ये तीनों महत्वपूर्ण व्यक्ति केवल भय या लाभ की आशा से प्रिय या मीठी बातें कहने लगते हैं और कड़वी मगर सच्ची सलाह देना छोड़ देते हैं, तो उनका यह व्यवहार शीघ्र ही राज्य (राज-काज), शरीर (स्वास्थ्य) और धर्म (आत्मा)—इन तीनों का विनाश कर देता है।

मीठी बातों से राजा सही निर्णय नहीं ले पाता, जिससे राज्य का पतन होता है; झूठी तसल्ली से वैद्य रोग का निवारण नहीं कर पाता, जिससे शरीर नष्ट होता है और असत्य पर आधारित उपदेश से धर्म या आध्यात्मिक कल्याण असंभव हो जाता है।

अतः इस दोहे का सार यह है कि निष्पक्ष और सच्ची सलाह ही जीवन के इन तीन आधारों—शासन, स्वास्थ्य और आध्यात्म—को बचाती है।


दोहा 7-Class 11-Tulasi key Dohey-couplet 7

शब्दार्थ:

  • मुखिआ = नेता
  • मुख = मुँह
  • पालइ = पालना

भाव:
इस दोहे में तुलसीदास जी परिवार या समुदाय के मुखिया (नेता) की तुलना मनुष्य के ‘मुख’ (मुँह) से करते हैं।

जिस प्रकार मुँह अकेले भोजन करता है, लेकिन उस भोजन से मिली शक्ति और पोषण शरीर के सभी अंगों को मिलता है—हाथ, पैर, आँख आदि को—ठीक उसी तरह मुखिया का काम भी होना चाहिए।

मुखिया को चाहिए कि वह विवेक (बुद्धिमानी और समझदारी) से काम करे और पूरे परिवार या समुदाय का ध्यान रखे (पालइ पोषइ सकल अंग)। इसका अर्थ है कि मुखिया को सभी सदस्यों के बीच समानता और न्याय सुनिश्चित करना चाहिए। मुखिया का लाभ केवल उसका अपना लाभ नहीं होना चाहिए, बल्कि पूरे समुदाय का लाभ होना चाहिए।


दोहा 8

शब्दार्थ:

  • दीन हितु = मददगार
  • अंबुज = कमल
  • अंबु = पानी
  • तरीन = सूर्य की किरणें
  • रिपु = शत्रु

भाव:
यह दोहा निःस्वार्थ प्रेम और साथ के महत्व को बताता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को यह लगे कि कठिन समय में उसका कोई हितैषी या मददगार नहीं है और सबने उसका साथ छोड़ दिया है, तो ऐसी स्थिति में दुनिया के लोग उसके शत्रु बन जाते हैं।

इसे समझाने के लिए तुलसीदास जी ने कमल और पानी का उदाहरण दिया है। कमल पानी के बिना नहीं रह सकता। जब पानी सूख जाता है, तब सूर्य की किरणें, जो पहले कमल को खिलाती थीं, वही उसे जलाने लगती हैं।

अर्थात जब हमारे पास समर्थन या आधार नहीं होता, तो जो चीजें पहले हमारे लिए अच्छी थीं, वे ही हमारी शत्रु बन जाती हैं।


अभ्यास-कार्य

अ. निम्नलिखित दोहों का भावार्थ लिखिए

1.

तुलसी संत सुअंबतरू, फूलि फरहिं पर हेत।
इतते वे पाहन हनैं, उतते वे फल देत।।

2.

आवत ही हरषै नहि, नैनन नहिं सनेह।
तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह।।

3.

सचिव, बैद, गुर तीनि, जौं प्रिय बोलहिं भयआस।
राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास।।

आ. एक वाक्य में उत्तर दीजिए

  1. तुलसीदास किस भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं?
  2. तुलसी के बचपन का नाम क्या था?
  3. तुलसी ने संत की तुलना किससे की है?
  4. ‘कंचन’ शब्द का अर्थ क्या है?

इ. निम्नलिखित पद्यांशों की संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए

1.

काम, क्रोध, मद, लोभ सब, नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि, भजहु भजहिं जेहि संत।।

2.

मुखिआ सुखु सो चाहिए, खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग, तुलसी सहित बिबेक।।

Hari Prasad

I am P. Hari Prasad , a Lecturer with 12+ years of experience in teaching and content writing. My expertise lies in simplifying complex topics, clarifying doubts, and creating well-researched, accurate articles. As an educator and writer, I strive to provide trustworthy and valuable information to my readers. If you have any questions or need further clarification, feel free to comment below—I’m here to help!

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