Vatsalya Ras Ki Paribhasha, Sthayi Bhav aur Udaharan | वात्सल्य रस की पूरी जानकारी (Surdas Ke Dohe)

By Aarush Khanna

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वात्सल्य रस के अवयव-elements of vastalyav

वात्सल्य रस हिन्दी काव्यशास्त्र के उन रसों में से एक है जो सीधे हमारे पारिवारिक जीवन से जुड़ा है — यह बड़ों का छोटों के प्रति उमड़ने वाला वह सहज, निश्छल स्नेह है जिसे हर माता-पिता, गुरु और बड़ा भाई-बहन अपने भीतर महसूस करता है। इस लेख में हम वात्सल्य रस की परिभाषा (Vatsalya Ras Ki Paribhasha), इसका स्थायी भाव, इसके अवयव, इतिहास, भेद तथा सूरदास व तुलसीदास के प्रसिद्ध पदों से उदाहरण — सब कुछ सरल भाषा में समझेंगे। “रस” के शाब्दिक अर्थ और अन्य प्रकारों को विस्तार से समझने के लिए हमारा रस का शाब्दिक अर्थ और प्रयोग वाला लेख भी पढ़ सकते हैं।

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वात्सल्य रस क्या है? (What is Vatsalya Ras? — Meaning & Definition)

वात्सल्य रस का स्थायी भाव वात्सल्य अर्थात् संतान के प्रति सहज, अकृत्रिम स्नेह है। माता-पिता का अपनी संतान के प्रति, गुरु का अपने शिष्य के प्रति, तथा बड़े भाई-बहन का छोटे भाई-बहन के प्रति जो ममत्वपूर्ण लगाव होता है, उसे स्नेह कहते हैं। जब यही स्नेह अपने पूर्ण एवं प्रगाढ़ रूप में प्रकट होकर काव्य में व्यंजित होता है, तब वह वात्सल्य रस कहलाता है।

अथवा — संतान के प्रति अभिभावकों का जो सहज एवं नैसर्गिक प्रेम होता है, उसी को ‘वात्सल्य’ नाम दिया गया है। मनोविज्ञान के विद्वानों ने वात्सल्य को मूल एवं प्रमुख भावों में गिना है; व्यावहारिक अनुभव भी यही दर्शाता है कि संतान के प्रति यह लगाव दांपत्य-प्रेम से बहुत पीछे नहीं ठहरता।

वात्सल्य रस की परिभाषा (Vatsalya Ras Ki Paribhasha) संक्षेप में यही है — बड़ों का छोटों के प्रति उमड़ने वाला सहज, निश्छल स्नेह, जब काव्य में पूर्ण रूप से व्यंजित हो, तो वही वात्सल्य रस बन जाता है।

  • संस्कृत के प्राचीन आचार्यों ने देव-विषयक अनुराग को ही एकमात्र स्वतंत्र ‘भाव’ स्वीकार किया था और वात्सल्य को उसी अनुराग की एक शाखा भर माना, स्वतंत्र स्थायी भाव के रूप में नहीं।
  • आचार्य सोमेश्वर स्नेह, भक्ति और वात्सल्य — तीनों को ‘रति’ के ही भिन्न-भिन्न रूप बताते हैं।
  • किंतु संतान-स्नेह की तीव्रता, उसकी अनुभूतिजन्य गहराई तथा उसके व्यावहारिक प्रभाव पर विचार करने से यही प्रतीत होता है कि वात्सल्य को एक स्वतंत्र एवं स्थायी भाव मान लेना ही उचित है।
  • भोजराज सरीखे कुछ आचार्यों ने भी इसकी स्वतंत्र सत्ता को मान्यता प्रदान की है।
  • आचार्य विश्वनाथ ने इसके स्फुट चमत्कारपूर्ण प्रभाव के आधार पर वत्सल रस का स्वतंत्र अस्तित्व सिद्ध करते हुए ‘वत्सलता-स्नेह’ को इसका स्पष्ट स्थायी भाव प्रतिपादित किया है।

हर्ष, गर्व, आवेग तथा अनिष्ट की आशंका आदि वात्सल्य के व्यभिचारी (संचारी) भाव माने गए हैं। उदाहरणस्वरूप देखें —

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै, मल्हावै, जोई-सोई कछु गावै॥
— सूरदास

इस पद में केवल वात्सल्य भाव की झलक भर मिलती है; स्थायी भाव का पूर्ण परिपाक अभी नहीं हुआ है।

(Elements of Vatsalya Ras — Sthayi Bhav, Alamban, Uddipan, Anubhav)

वात्सल्य रस के अवयव-Vatsalya Ras Ki Paribhasha1
वात्सल्य रस के अवयव-Vatsalya Ras Ki Paribhasha1

 

  • स्थायी भाव-Sthayi Bhav : वत्सलता अथवा स्नेह।
  • आलंबन विभाव-Alamban Vibhag   : संतान, शिशु अथवा शिष्य।
  • उद्दीपन विभाव-Uddipan Vibhag : बालक की तोतली बोली, मचलना, हठ करना, उसका सलोना रूप तथा उससे जुड़ी वस्तुएँ।
  • अनुभावAnubhav: बालक को स्नेहवश गोद में उठाना, चूमना, सिर सहलाना, थपकी देना आदि।
  • संचारी भावSanchari Bhav: हर्ष, गर्व, ममता, चिंता, आवेग, अनिष्ट की आशंका आदि।

वात्सल्य रस की उत्पत्ति और विकास (Origin & Development of Vatsalya Ras)

‘वात्सल्य’ शब्द मूलतः ‘वत्स’ (संतान) के प्रति उमड़ने वाले सहज अनुराग का ही पर्याय है। संभवतः इसी कारण प्राचीन आचार्यों ने इसे ‘वात्सल्य रस’ कहने के बजाय ‘वत्सल रस’ कहना अधिक उपयुक्त समझा, और वत्सलता अथवा स्नेह को इसका स्थायी भाव निरूपित किया।

  • भोजराज के अनुसार वात्सल्य रस का आलंबन संतान और अनुभाव उसका दुलार-पुचकार है।
  • आचार्य विश्वनाथ के अनुसार बालोचित चेष्टाओं के साथ-साथ बालक की चतुरता, साहस और दयाभाव आदि इसके उद्दीपन कहे गए हैं; आलिंगन, अंगस्पर्श, मस्तक चूमना, निहारना, रोमांच और आनंदाश्रु इसके अनुभाव हैं; तथा अनिष्ट की आशंका, हर्ष, गर्व आदि इसके संचारी भाव माने गए हैं।
  • भोजराज ने श्रृंगार को रसराज सिद्ध करने के प्रसंग में अन्य रसों की गणना करते हुए ‘वत्सल रस’ को जोड़कर कुल दस रस गिनाए थे, जिससे प्रतीत होता है कि उनके समय तक वात्सल्य रस को रस के रूप में मान्यता मिलनी आरंभ हो चुकी थी।
  • आचार्य विश्वनाथ के ‘साहित्यदर्पण’ में इसका जो सांगोपांग निरूपण हुआ, उससे स्पष्ट होता है कि कालक्रम में इसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक मान्यता एवं विस्तार प्राप्त होता गया।
  • भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र‘ में ऐसा कोई सीधा सूत्र नहीं मिलता जिससे इसकी सिद्धि हो सके; आठ मूल रसों की सूची से मिलान करने पर अधिक-से-अधिक नौ रसों तक ही स्वीकृति ठहरती है।
  • वात्सल्य रस के उद्भव का कुछ सूत्र भामह, दंडी, उद्भट और रुद्रट जैसे आलंकारिकों द्वारा वर्णित ‘प्रेयस्’ नामक अलंकार में भी खोजा जा सकता है।
  • अभिनवगुप्त ने ‘अभिनवभारती’ में नौ रसों की चर्चा के उपरांत अन्य रसों की संभावना का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए लिखा है कि बालक का माता-पिता के प्रति स्नेह भय में विलीन हो जाता प्रतीत होता है, और वृद्ध माता-पिता का संतान के प्रति स्नेह भी इसी प्रकार देखा जाना चाहिए।

वात्सल्य रस का स्थायी भाव (Vatsalya Ras Ka Sthayi Bhav — कौन-सा भाव माना जाए?)

वात्सल्य के स्थायी भाव को लेकर भी विद्वानों में मतभेद रहा है —

  • कवि कर्णपूर ने ‘ममकार’ को, तो कुछ अन्य आचार्यों ने ‘कारुण्य’ को इसका स्थायी भाव माना है।
  • आरंभिक काल में वात्सल्य का अभिव्यंजन श्रृंगार रस के अंतर्गत ही किया जाता रहा, क्योंकि वत्सलता भी रति का ही एक विशिष्ट रूप है।
  • सोमेश्वर ने रति के तीन भेद बताते हुए लिखा है — समान अवस्था वालों की परस्पर रति का नाम ‘स्नेह’, छोटे का बड़े के प्रति अनुराग ‘भक्ति’, और बड़े का छोटे के प्रति अनुराग ‘वात्सल्य’ कहलाता है।

सर्वाधिक मान्यता वत्सलता-स्नेह को ही मिली है, इसलिए वात्सल्य रस का स्थायी भाव मूल रूप से वत्सलता/स्नेह ही माना जाता है।

रीतिकाल और वात्सल्य रस (Vatsalya Ras in the Ritikal Era)

केशवदास, चिंतामणि, भिखारीदास जैसे प्रायः सभी प्रमुख रीतिकालीन काव्याचार्यों ने वात्सल्य रस की उपेक्षा ही की और नौ रसों की रूढ़ परंपरा का पालन किया। इसके विपरीत भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अपने नाटकों में अन्य रसों के साथ वात्सल्य को भी स्थान दिया, और साथ ही दास्य, सख्य तथा माधुर्य भावों की भी गणना की — जिससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने इसकी अवतारणा गौड़ीय भक्ति-संप्रदाय के प्रभाव में की, जो उनके समय तक वैष्णव भक्ति-जगत में प्रायः सर्वमान्य हो चुका था।

सूरदास का वात्सल्य वर्णन (Surdas Ka Vatsalya Varnan — सूरदास का वात्सल्य-चित्रण)

सूरदास ने वात्सल्य भाव का इतना गहन और व्यापक चित्रण किया कि ‘सूरसागर’ को सामने रखते हुए वात्सल्य को स्वतंत्र रस न मानना एक विडंबना-सा ही जान पड़ता है। कृष्ण-लीला के अंतर्गत सूर का वात्सल्य-वर्णन रस-सिद्धि के लिए आवश्यक सभी अंग-उपांगों को अपने भीतर समेटे हुए है। ‘सूरसागर’ में माता यशोदा तथा अन्य वयस्क गोपियों का शिशु कृष्ण के प्रति प्रेम, आकर्षण, खीझ, चिंता एवं उलाहना — यह सब वात्सल्य रस की ही समृद्ध सामग्री है। इसी भक्ति-भाव की एक और झलक हमारे कर्पूर गौरं करुणावतारं मंत्र वाले लेख में भी मिलती है।

तुलसीदास का वात्सल्य-चित्रण (Tulsidas’s Depiction of Vatsalya Ras)

तुलसीदास की ‘गीतावली’, ‘कृष्ण गीतावली’ तथा ‘कवितावली’ में भी ‘रामचरितमानस’ से इतर वात्सल्य रस से ओतप्रोत काव्य-रचनाएँ प्राप्त होती हैं।

आधुनिक काल में वात्सल्य रस (Vatsalya Ras in Modern Hindi Poetry)

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ के ‘प्रियप्रवास’ तथा मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ एवं ‘यशोधरा’ में वात्सल्य भाव नई-नई भूमिकाओं में मुखर हुआ है। प्राचीन संस्कृत अथवा हिंदी के किसी आचार्य ने संभवतः वात्सल्य रस के भेद-उपभेद करने का प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि अधिकांश आचार्यों ने इसे रस के रूप में स्वीकार ही नहीं किया था।

वात्सल्य रस के भेद (Types / Bhed of Vatsalya Ras)

शोधकर्ता आनंदप्रकाश दीक्षित ने अपने ग्रंथ ‘काव्य में रस’ में वात्सल्य के निम्नलिखित उपभेद गिनाए हैं —

  1. गच्छत्प्रवास
  2. प्रवासस्थित
  3. प्रवासागत
  4. करुण

ये चारों उपभेद वस्तुतः ‘वियोग-वात्सल्य’ के अंतर्गत ही आते हैं, जो स्वयं एक भेद है। श्रृंगार रस की भाँति वात्सल्य के भी संयोग और वियोग के आधार पर दो प्रमुख भेद किए गए हैं —

  1. करुण-वात्सल्य नामक भेद करुण श्रृंगार के समानांतर ठहरता है।
  2. प्रवास पर आधारित वियोग-भेद वात्सल्य रस में उतना सशक्त सिद्ध नहीं होता, जितना विप्रलंभ श्रृंगार में होता है, क्योंकि एक निश्चित अवस्था तक शिशु में प्रवास करने की सामर्थ्य ही नहीं होती।

वात्सल्य रस के उदाहरण (Vatsalya Ras Ke Udaharan — Examples from Surdas)

उदाहरण 1

मैया, कबहुँ बढ़ैगी चोटी?
कितिक बार मोहिं दूध पिअत भई, यह अजहूँ है छोटी॥
— सूरदास

उदाहरण 2

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद के आँगन, बिंब पकरिबे धावत॥
— सूरदास

उदाहरण 3

मैया, मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परैं, ये सखा सबै मिलि, मेरे मुख लपटायो॥
— सूरदास

यहाँ बालक कृष्ण का निर्दोष हठ और माता का सहज-कोमल दुलार दोनों मिलकर वात्सल्य भाव को सजीव कर देते हैं।

वात्सल्य रस के अवयव — एक दृष्टि में

  • स्थायी भाव : वत्सलता / स्नेह।
  • आलंबन (विभाव) : संतान, शिशु, शिष्य।
  • उद्दीपन (विभाव) : बालक की चेष्टाएँ, तोतली बोली, हठ आदि तथा उसके रूप एवं वस्तुएँ।
  • अनुभाव : स्नेह से गोद में लेना, आलिंगन, सिर सहलाना, थपकी देना आदि।
  • संचारी भाव : हर्ष, गर्व, मोह, चिंता, आवेग, आशंका आदि।

रस के प्रकार अथवा भेद (Types of Rasa in Hindi Poetics)

साहित्यशास्त्र में सामान्यतः निम्नलिखित रसों को मान्यता प्राप्त है — श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करुण, वीर, अद्भुत, वीभत्स, भयानक, शांत, वात्सल्य और भक्ति रस। इन सभी रसों को उनके स्थायी भाव सहित विस्तार से हमारे रस का शाब्दिक अर्थ और प्रयोग वाले लेख में समझाया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) — Vatsalya Ras

1. What is the meaning of ‘Vatsalya Rasa’?

Vatsalya Rasa is the aesthetic sentiment (rasa) of tender, parental-style affection — the emotional flavour a reader or audience experiences when a poem or scene depicts deep, selfless love for a child.

2. वात्सल्य रस किसे कहते हैं?

जब बड़ों का छोटों (संतान, शिष्य, छोटे भाई-बहन) के प्रति स्नेह इतना प्रगाढ़ हो जाए कि वह काव्य में पूर्ण रस के रूप में व्यंजित होने लगे, तो उसे वात्सल्य रस कहते हैं।

3. वात्सल्य रस की परिभाषा क्या है?

वात्सल्य रस की परिभाषा है — वत्सलता (स्नेह) नामक स्थायी भाव का, आलंबन (संतान), उद्दीपन (बालक की चेष्टाएँ), अनुभाव (दुलार) और संचारी भावों (हर्ष, चिंता आदि) के संयोग से रस रूप में परिपक्व होना।

4. Vatsalya ras kya hota hai?

Vatsalya ras वह भाव-दशा है जिसमें बड़े का छोटे के प्रति स्नेह पाठक के मन में भी वैसी ही कोमल अनुभूति जगा देता है — जैसे माँ का बच्चे के प्रति ममत्व।

5. वात्सल्य रस का अर्थ क्या है?

‘वत्सल’ शब्द ‘वत्स’ (संतान) से बना है, जिसका अर्थ है संतान के प्रति स्नेह रखने वाला। अतः वात्सल्य रस का शाब्दिक अर्थ हुआ — संतान-प्रेम से उपजा रस।

6. वात्सल्य रस का संबंध किससे है?

इसका संबंध मुख्यतः माता-पिता व संतान के स्नेह से है, पर यह गुरु-शिष्य और बड़े-छोटे भाई-बहन के स्नेह तक भी फैला हुआ है। आरंभ में इसे श्रृंगार रस की उपशाखा माना जाता था; बाद में भोजराज व विश्वनाथ जैसे आचार्यों ने इसे स्वतंत्र रस के रूप में प्रतिष्ठित किया।

7. ‘वात्सल्य रस’ का स्थायी भाव क्या है?

वात्सल्य रस का स्थायी भाव वत्सलता अथवा स्नेह है। कुछ आचार्यों ने इसके स्थान पर ‘ममकार’ या ‘कारुण्य’ को भी स्थायी भाव माना है, किंतु सर्वाधिक मान्यता वत्सलता-स्नेह को ही मिली है।

8. वात्सल्य रस का आलंबन (विभाव) क्या है?

आलंबन विभाव वह होता है जिस पर स्नेह केंद्रित हो — यहाँ संतान, शिशु अथवा शिष्य ही वात्सल्य रस का आलंबन है।

9. वात्सल्य रस का उद्दीपन (विभाव) क्या है?

बालक की तोतली बोली, मचलना, हठ करना, उसकी बाल-सुलभ चेष्टाएँ तथा उसका सलोना रूप — ये सब वात्सल्य रस के उद्दीपन विभाव कहलाते हैं, क्योंकि ये स्थायी भाव को उद्दीप्त (तीव्र) करते हैं।

10. वात्सल्य रस के संचारी भाव कौन-कौन से हैं?

हर्ष, गर्व, ममता, चिंता, आवेग, मोह तथा अनिष्ट की आशंका — ये सभी वात्सल्य रस के प्रमुख संचारी (व्यभिचारी) भाव माने गए हैं।

11. वात्सल्य रस के उदाहरण क्या हैं?

वात्सल्य रस के उदाहरण ऊपर के अनुभाग में दिए गए हैं — जैसे ‘मैया, कबहुँ बढ़ैगी चोटी’, ‘किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत’ और ‘मैया, मैं नहिं माखन खायो’ — ये तीनों सूरदास के प्रसिद्ध पद वात्सल्य भाव के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

12. वात्सल्य रस के कवि कौन हैं?

सूरदास इस रस के सबसे प्रमुख कवि माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त तुलसीदास, नंददास, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ और मैथिलीशरण गुप्त ने भी वात्सल्य रस की उल्लेखनीय रचनाएँ की हैं।

13. वात्सल्य रस का सम्राट किस कवि को कहा जाता है?

सूरदास को हिंदी साहित्य में ‘वात्सल्य रस का सम्राट’ कहा जाता है, क्योंकि ‘सूरसागर’ में उन्होंने बाल कृष्ण की लीलाओं के माध्यम से इस रस को जितनी गहराई और विविधता से चित्रित किया, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है।

14. क्या ‘जसोदा हरि पालनै झुलावै’ पंक्ति में वात्सल्य रस है?

हाँ, इसमें वात्सल्य भाव स्पष्ट रूप से व्यंजित है — यशोदा का पालने में झुलाते हुए दुलार करना अनुभाव है। हालाँकि परंपरागत रूप से यह पंक्ति भाव के स्तर पर उदाहरण मानी जाती है, स्थायी भाव के पूर्ण परिपाक (रस-सिद्धि) के लिए आगे के अनुभाव-संचारी भाव भी आवश्यक होते हैं।

15. सूरदास के पदों में वात्सल्य रस के उदाहरण क्या हैं?

‘मैया, कबहुँ बढ़ैगी चोटी’, ‘किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत’ और ‘मैया, मैं नहिं माखन खायो’ — ये तीनों पद सूरदास के वात्सल्य-वर्णन के सर्वाधिक चर्चित उदाहरण हैं।

16. वात्सल्य रस का उदाहरण ‘मैया मैं नहिं माखन खायो’ में कैसे है?

इस पद में बाल कृष्ण माखन चुराने से मासूमियत के साथ इनकार करते हैं, और यशोदा का स्नेहसिक्त, आधा-विश्वास आधा-दुलार वाला भाव उभरता है। बालक की चतुराई (उद्दीपन) और माँ का वात्सल्यपूर्ण प्रत्युत्तर (अनुभाव) मिलकर इसे वात्सल्य रस का सुंदर उदाहरण बनाते हैं।

17. वात्सल्य रस को किसने जोड़ा?

आचार्य भोजराज ने सबसे पहले ‘वत्सल रस’ को अन्य रसों की सूची में जोड़कर कुल दस रस गिनाए। बाद में आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्यदर्पण’ में इसका विस्तृत और सुव्यवस्थित निरूपण किया।

18. वात्सल्य रस को दसवाँ रस किसने माना?

भोजराज ने ही वात्सल्य (वत्सल) रस को दसवें रस के रूप में गिनाया था, जब उन्होंने श्रृंगार को रसराज सिद्ध करने के प्रसंग में अन्य रसों की सूची प्रस्तुत की।

19. क्या प्राचीन आचार्यों ने वात्सल्य रस को रस की श्रेणी में स्थान दिया?

नहीं। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में वर्णित मूल आठ (बाद में नौ) रसों में वात्सल्य को स्थान नहीं मिला था। इसे रस के रूप में मान्यता बाद के आचार्यों — विशेषतः भोजराज और विश्वनाथ — ने ही दी।

20. वात्सल्य रस के प्रतिष्ठापक आचार्य कौन हैं?

वात्सल्य रस को सैद्धांतिक रूप से प्रतिष्ठित करने का श्रेय मुख्यतः आचार्य भोजराज और आचार्य विश्वनाथ को दिया जाता है।

21. भक्ति रस और वात्सल्य रस में क्या अंतर है?

आचार्य सोमेश्वर के अनुसार दिशा का अंतर है — भक्ति में छोटा बड़े (आराध्य/ईश्वर) के प्रति अनुराग रखता है, जबकि वात्सल्य में बड़ा छोटे (संतान) के प्रति अनुराग रखता है। दोनों रति के ही विपरीत दिशाओं वाले रूप हैं।

22. वात्सल्य रस की उत्पत्ति कैसे होती है?

आलंबन (बालक) और उद्दीपन (उसकी चेष्टाएँ) के संयोग से स्थायी भाव वत्सलता जाग्रत होती है; जब यह अनुभावों (दुलार आदि) और संचारी भावों (हर्ष, चिंता आदि) से पुष्ट होकर सहृदय पाठक के मन में सौंदर्यबोध जगाती है, तभी यह रस रूप में परिणत होती है।

23. वात्सल्य रस का स्थायी भाव ‘वत्सलता’ या ‘स्नेह’ क्यों है?

क्योंकि यह भाव नैसर्गिक, स्थिर और सार्वभौमिक है — हर सहृदय पाठक या दर्शक में संतान अथवा शिशु को देखकर सहज ही जाग उठता है, इसीलिए इसे ‘स्थायी’ भाव की श्रेणी में रखा गया।

24. क्या वात्सल्य रस केवल माता-पिता के प्रेम तक सीमित है?

नहीं। यद्यपि माता-पिता का संतान-प्रेम इसका सबसे सामान्य रूप है, पर वात्सल्य रस गुरु का शिष्य के प्रति, तथा बड़े भाई-बहन का छोटे भाई-बहन के प्रति स्नेह— इन सभी संबंधों तक विस्तृत है।

25. वात्सल्य रस की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

नैसर्गिकता (सहज-अकृत्रिम होना), सार्वभौमिकता (हर संस्कृति-काल में समान रूप से अनुभूत), कोमलता, निश्छलता तथा संयोग-वियोग दोनों रूपों में समान रूप से अभिव्यक्त होना — ये इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।


लेखक के बारे में: आरुष खन्ना आर्टिकल पब्लिशिंग और कंटेंट रिसर्च के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव रखते हैं, और हिन्दी साहित्य व शिक्षा से जुड़ी सामग्री hindimeanings.com के लिए तैयार करते हैं।

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